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स्वास्थ्य · vitark.ai

हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम खारिज हो गया? चुनौती देने का तरीका

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सार

अगर आपका हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम इस आधार पर खारिज हुआ कि आपने पहले से मौजूद बीमारी छिपाई, तो साबित करने का भार बीमा कंपनी पर है, आप पर नहीं। कंपनी को ठोस चिकित्सा सबूत से यह दिखाना होगा कि बीमारी मौजूद थी, वह एक महत्वपूर्ण तथ्य थी, और आपको उसकी वास्तव में जानकारी थी तथा आपने उसे जानबूझकर छिपाया। आपका अपना कर्तव्य उतना ही है जितना आप जानते थे। आप उपभोक्ता आयोग में सेवा में कमी की शिकायत दायर कर सकते हैं, और अदालतें बार-बार अनुमान पर आधारित, बिना सबूत की अस्वीकृतियां रद्द कर चुकी हैं।

कानून क्या कहता है

पहले से मौजूद बीमारी पर कौन क्या साबित करेगा. ज्यादातर अस्वीकृतियों की जड़ यही है, और कानून भार बीमा कंपनी पर डालता है। जब कंपनी इस आधार पर क्लेम खारिज करती है कि आपने पहले से मौजूद बीमारी नहीं बताई, तो उसे पूर्व निदान या इलाज के ठोस चिकित्सा सबूत से यह साबित करना होगा कि बीमारी मौजूद थी, वह महत्वपूर्ण तथ्य थी, और आपको उसकी वास्तव में जानकारी थी तथा आपने उसे जानबूझकर छिपाया। किसी पैनल डॉक्टर का यह अनुमान कि बीमारी "जरूर रही होगी", या बिना पुष्टि की जांचकर्ता रिपोर्ट, पर्याप्त नहीं है।

आपका कर्तव्य उतना ही है जितना आप जानते थे. बीमा परम सद्भाव (utmost good faith) पर चलता है, इसलिए आपको अपनी जानकारी में आने वाले महत्वपूर्ण तथ्यों का ईमानदारी से खुलासा करना होता है, और किसी ज्ञात गंभीर बीमारी को छिपाना क्लेम को वैध रूप से खारिज करा सकता है। पर यह कर्तव्य उतने तक ही है जितना आप जानते थे या उचित रूप से जानने की अपेक्षा की जा सकती थी। जिस छिपी बीमारी की आपको जानकारी ही न थी, उसके लिए आपको दंडित नहीं किया जा सकता, और ऐसा कोई लक्षण जिसका कभी बीमारी के रूप में निदान या इलाज नहीं हुआ, अपने आप में अस्वीकृति का वैध आधार नहीं है।

दो बातें जो अस्वीकृति को कमजोर करती हैं. पहली, अगर बीमा कंपनी ने पॉलिसी देने से पहले आपकी चिकित्सा जांच कराई और आपके स्वास्थ्य से संतुष्ट हुई, तो वह आमतौर पर बाद में किसी ऐसी पहले से मौजूद बीमारी पर क्लेम खारिज नहीं कर सकती जिसे वह अपनी जांच में नहीं पकड़ पाई। दूसरी, अगर प्रस्ताव फॉर्म में स्वास्थ्य का कोई महत्वपूर्ण सवाल खाली छोड़ दिया गया था, तो कंपनी को पॉलिसी देने से पहले उसे सत्यापित करना था, और वह बाद में यह नहीं कह सकती कि आपने सक्रिय रूप से छिपाया।

आम बीमारियां और संबंध का होना जरूरी. सामान्य मधुमेह या उच्च रक्तचाप अपने आप किसी असंबंधित हृदय घटना के लिए 'पहले से मौजूद बीमारी' नहीं बन जाते, जब तक कंपनी उनकी गंभीरता और सीधा नैदानिक संबंध न दिखाए। और जहां कथित रूप से न बताई गई स्थिति का अस्पताल में भर्ती या मृत्यु के असली कारण से कोई संबंध ही न हो, वहां अस्वीकृति अनुचित है।

धारा 45 और नवीनीकरण. बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 45 के तहत जीवन बीमा पॉलिसी को उसके जारी होने से तीन वर्ष बाद किसी भी आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती, और उससे पहले भी बीमाकर्ता को धोखाधड़ी तथा महत्वपूर्ण तथ्य के छिपाव को साबित करना होता है। इसके अलावा, बीमा कंपनी नवीनीकरण के समय बिना सूचना दिए शर्तें बदल या कवरेज पर सीमा नहीं लगा सकती; ऐसा करना सेवा में कमी है।

कहां शिकायत करें. बीमा और चिकित्सा दोनों उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत 'सेवा' हैं, इसलिए पॉलिसीधारक या लाभार्थी 'उपभोक्ता' है और उपभोक्ता आयोग में सेवा में कमी की शिकायत दायर कर, क्लेम राशि तथा मुआवजा मांग सकता है। पर जहां बीमाकर्ता धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप लगाए और तथ्य गंभीर रूप से विवादित हों, वहां रिट याचिका के बजाय दीवानी अदालत उचित मंच है।

आप क्या कर सकते हैं

  1. लिखित अस्वीकृति (repudiation) पत्र लें और उसमें दिया गया सटीक आधार पढ़ें। कंपनी आमतौर पर उसी आधार तक सीमित रहती है जो उसने दिया, इसलिए वही तय करता है कि आपको किसका जवाब देना है।
  2. अपने दस्तावेज जुटाएं: पॉलिसी और प्रस्ताव फॉर्म, पूरा मेडिकल रिकॉर्ड, अस्पताल के बिल, बीमा कंपनी या टीपीए से पत्राचार, और कंपनी द्वारा पॉलिसी से पहले कराई गई कोई भी चिकित्सा जांच।
  3. अगर आधार पहले से मौजूद बीमारी है, तो याद रखें कि कंपनी को ठोस चिकित्सा सबूत से यह साबित करना है कि आपको जानकारी थी और आपने जानबूझकर छिपाया। कंपनी की अपनी कराई किसी पॉलिसी-पूर्व जांच, या उसके द्वारा असत्यापित छोड़े गए सवाल की ओर इशारा करें।
  4. पहले बीमा कंपनी के शिकायत प्रकोष्ठ (grievance cell) में शिकायत बढ़ाएं। हल न हो तो उपभोक्ता आयोग में सेवा में कमी की शिकायत दायर करें और क्लेम राशि तथा मुआवजा मांगें।
  5. पॉलिसी का लाभार्थी, जैसे नामांकित व्यक्ति (nominee), भी दावा दायर कर सकता है, क्योंकि वह भी 'उपभोक्ता' है।
  6. जहां बीमाकर्ता धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगाए और तथ्य गहराई से विवादित हों, वहां दीवानी अदालत उचित मंच है, रिट याचिका नहीं।

अहम फैसले

Mahakali Sujatha v. The Branch Manager, Future Generali India Life Insurance Company Limited, सुप्रीम कोर्ट (2024). कंपनी ने यह आरोप लगाकर क्लेम खारिज किया था कि मृतक ने अन्य पॉलिसियों की जानकारी छिपाई, पर इसका कोई दस्तावेजी सबूत नहीं दिया। न्यायालय ने माना कि "जो दावा करता है, उसे साबित करना होता है", और महत्वपूर्ण तथ्य के छिपाव तथा बीमित की उसकी जानकारी को साबित करने का भार बीमा कंपनी पर है, इसलिए महज आरोप पर की गई अस्वीकृति अवैध है।

Shriram Life Insurance Co. Ltd. v. Santosh Behera, ओड़िशा हाई कोर्ट (2024). कंपनी ने पहले से मौजूद बीमारी छिपाने का आरोप लगाया था। न्यायालय ने माना कि जब तक कंपनी यह साबित न कर दे कि पॉलिसीधारक को उस गंभीर बीमारी की वास्तव में जानकारी थी और उसने जानबूझकर छिपाया, तब तक क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता। बिना जानकारी के गैर-प्रकटीकरण को छिपाव या धोखाधड़ी नहीं माना जाएगा।

Satwant Kaur Sandhu v. New India Assurance Company Ltd., सुप्रीम कोर्ट (2009). यह दूसरा पहलू दिखाता है। बीमित व्यक्ति ने प्रस्ताव फॉर्म में अपनी ज्ञात गंभीर बीमारियों, मधुमेह और क्रोनिक रीनल फेल्योर, को छिपाया था। न्यायालय ने माना कि बीमा परम सद्भाव पर चलता है और अपनी जानकारी के महत्वपूर्ण तथ्यों का सही खुलासा करना कर्तव्य है, इसलिए ऐसे ज्ञात तथ्यों को छिपाना क्लेम की वैध अस्वीकृति का आधार बनता है।

Jacob Punnen & Anr. v. United India Insurance Co. Ltd., सुप्रीम कोर्ट (2021). कंपनी ने नवीनीकरण के समय बिना सूचना दिए कुछ सर्जरी के कवरेज पर सीमा लगा दी थी। न्यायालय ने माना कि नवीनीकरण के समय उत्पाद के चयन को प्रभावित करने वाले किसी भी महत्वपूर्ण बदलाव की सूचना देना बीमाकर्ता का कर्तव्य है, और इस सूचनात्मक कर्तव्य का उल्लंघन सेवा में कमी है।

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