कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना कर रही हैं? POSH कानून के तहत आपके अधिकार
Read this article in Englishअगर आपके कार्यस्थल पर 10 या अधिक कर्मचारी हैं, तो कानून के मुताबिक वहां एक सही ढंग से गठित आंतरिक समिति होनी ही चाहिए, जिसकी अध्यक्ष वरिष्ठ महिला कर्मचारी हो और जिसमें एक स्वतंत्र बाहरी सदस्य हो। आप घटना के 3 महीने के भीतर लिखित शिकायत कर सकती हैं, समिति को 90 दिन में जांच पूरी करनी होती है, और रिपोर्ट मिलने के 60 दिन के भीतर नियोक्ता को कार्रवाई करनी होती है। शिकायत के बदले तबादला या नोटिस जैसी बदले की कार्रवाई खुद गैरकानूनी है, और पुलिस में जाने का रास्ता हमेशा खुला रहता है।
कानून क्या कहता है
कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013, जिसे POSH कानून कहा जाता है, सुरक्षित कार्यस्थल की जिम्मेदारी नियोक्ता पर डालता है। सुप्रीम कोर्ट इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान से जीने के मौलिक अधिकार से जोड़ चुका है।
आंतरिक समिति अनिवार्य है, और उसका गठन ही उसकी वैधता है। कानून की धारा 4 के तहत 10 या अधिक कर्मचारियों वाले हर कार्यस्थल पर लिखित आदेश से आंतरिक समिति बनानी होती है: अध्यक्ष वरिष्ठ महिला कर्मचारी, कम से कम आधी सदस्य महिलाएं, और एक स्वतंत्र बाहरी सदस्य। सुप्रीम कोर्ट ने Punjab and Sind Bank v. Mrs. Durgesh Kuwar (2020) में बैंक के अपने पैनल वकील को "स्वतंत्र सदस्य" बनाने को संस्थागत पूर्वाग्रह माना, जिसने पूरी जांच को दूषित कर दिया।
जांच असली कार्यवाही है, महज एचआर औपचारिकता नहीं। समिति के पास गवाह बुलाने और दस्तावेज मंगवाने की सिविल अदालत जैसी शक्तियां हैं। जांच में दोनों पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई मिलनी चाहिए; केरल हाई कोर्ट ने आरोपी को शिकायत की प्रति न देने और एकतरफा गवाही को प्राकृतिक न्याय का सीधा उल्लंघन माना। समिति के आरोप साबित करने पर नियोक्ता को सीधे अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी होती है; दोबारा अपनी अलग जांच बैठाने की जरूरत नहीं है (इलाहाबाद हाई कोर्ट, Indian Institute of Technology v. Prof. Anandh Subramaniam, 2023)।
समयसीमा तीन तरफ से तय है। शिकायत घटना के 3 महीने के भीतर लिखित में देनी होती है, जिसे उचित कारण पर बढ़ाया जा सकता है। समिति को जांच 90 दिन में पूरी करनी होती है, और रिपोर्ट मिलने के 60 दिन के भीतर नियोक्ता को सिफारिशों पर अमल करना होता है (कर्नाटक हाई कोर्ट, Shobha C. v. Union of India, 2025)। शिकायत को शुरुआत में ही "समय से बाहर" कहकर खारिज नहीं किया जा सकता; कलकत्ता हाई कोर्ट के मुताबिक परिसीमा तथ्य और कानून का मिला जुला सवाल है जिसे समिति को गुण दोष के साथ परखना होगा।
आपके ही कार्यस्थल की समिति सुनेगी। सुप्रीम कोर्ट ने Dr. Sohail Malik v. Union of India (2025) में साफ किया कि पीड़ित महिला अपने ही कार्यस्थल की समिति में शिकायत कर सकती है, भले ही आरोपी किसी दूसरे विभाग या बाहरी संगठन का कर्मचारी हो। शिकायत के लिए आपको आरोपी के दफ्तर नहीं जाना पड़ेगा।
लापरवाही और बदले की कार्रवाई महंगी पड़ती है। धारा 26 के तहत समिति न बनाने या कानून न मानने पर जुर्माना और लाइसेंस रद्द होने तक की सजा है। सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत की संवेदनहीन और देरी भरी हैंडलिंग पर नियोक्ता से संवैधानिक हर्जाना भी दिलवाया है (Nisha Priya Bhatia v. Union of India, 2020)।
POSH प्रक्रिया दीवानी और सेवा से जुड़ी राहत देती है। यह आपराधिक कानून की जगह नहीं लेती: आप समिति में शिकायत कर सकती हैं, पुलिस में जा सकती हैं, या दोनों साथ।
आप क्या कर सकते हैं
- घटना के 3 महीने के भीतर आंतरिक समिति को लिखित शिकायत दें। ज्यादा समय बीत गया हो तो भी शिकायत दें और देरी की वजह लिखें; समिति को उसे गुण दोष पर परखना होगा।
- समिति की बनावट पूछें। वरिष्ठ महिला अध्यक्ष, कम से कम आधी महिला सदस्य और सचमुच स्वतंत्र बाहरी सदस्य आपका कानूनी हक है। गलत गठित समिति की जांच अदालतों में टिकती नहीं।
- अपने सबूत और गवाह समिति के सामने रखें। समिति के पास उन्हें बुलाने की कानूनी शक्ति है।
- समिति की रिपोर्ट आपके पक्ष में आए तो 60 दिन के भीतर नियोक्ता से अमल की मांग लिखित में करें।
- समिति की सिफारिशों से असहमत हों तो धारा 18 के तहत अपील का रास्ता उपलब्ध है।
- शिकायत के बाद तबादला, कारण बताओ नोटिस या कोई और बदले की कार्रवाई हो तो उसे चुनौती दी जा सकती है; अदालतें ऐसी कार्रवाइयां लगातार रद्द करती रही हैं।
- आपके कार्यस्थल पर 10 से कम कर्मचारी हों या शिकायत खुद नियोक्ता के खिलाफ हो, तो जिले की स्थानीय समिति (Local Committee) के पास शिकायत की जा सकती है।
- पुलिस में एफआईआर का रास्ता हमेशा खुला है, POSH प्रक्रिया के साथ साथ भी।
अहम फैसले
Punjab and Sind Bank v. Mrs. Durgesh Kuwar, सुप्रीम कोर्ट (2020)। समिति के "स्वतंत्र सदस्य" की कुर्सी पर बैंक का अपना पैनल वकील बैठा था। अदालत ने इसे बुनियादी कानूनी दोष माना। समिति की बनावट कागजी खानापूर्ति नहीं, जांच की वैधता की शर्त है।
Dr. Sohail Malik v. Union of India, सुप्रीम कोर्ट (2025)। पीड़ित महिला के कार्यस्थल की समिति को बाहरी या दूसरे विभाग के कर्मचारी के खिलाफ शिकायत सुनने का पूरा क्षेत्राधिकार है। मंच आपका कार्यस्थल तय करता है, उत्पीड़क का नहीं।
Aureliano Fernandes v. State of Goa, सुप्रीम कोर्ट (2023)। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत "खाली मंत्र" नहीं हैं; जल्दबाजी के नाम पर निष्पक्ष सुनवाई की अनदेखी जांच को अमान्य कर देती है। यह नियम दोनों पक्षों की रक्षा करता है।
Nisha Priya Bhatia v. Union of India, सुप्रीम कोर्ट (2020)। शिकायत की संवेदनहीन हैंडलिंग और प्रक्रिया में देरी को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानकर अदालत ने हर्जाना दिलवाया। शिकायत को दबाना खुद कानूनी जोखिम है।