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पैसा और उधार · vitark.ai

दोस्त उधार के पैसे नहीं लौटा रहा? कानूनी तरीके से वसूली कैसे करें

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सार

दोस्त या रिश्तेदार को दिया उधार (फ्रेंडली लोन) आप सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत वसूली के मुकदमे से वापस पा सकते हैं, और अगर आपके पास लिखित अनुबंध, चेक या प्रॉमिसरी नोट है तो ऑर्डर 37 के तहत तेज चलने वाले 'संक्षिप्त मुकदमे' से भी। सबसे बड़ी बात है समय। ज्यादातर मामलों में समय-सीमा तीन साल है, और सादे फ्रेंडली लोन में यह उधार देने की तारीख से शुरू होती है। डिजिटल पेमेंट रिकॉर्ड लेनदेन को साबित तो करते हैं, पर उन्हें अदालत में सबूत मानने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B का प्रमाणपत्र लगाना जरूरी है।

कानून क्या कहता है

दोस्तों के बीच उधार के लिए कोई अलग कानून नहीं है। वसूली आम सिविल कानून से होती है, और आपका मामला दो बातों पर टिकता है: आप कौन सा रास्ता चुनते हैं, और आप समय-सीमा के भीतर हैं या नहीं।

रास्ता. आप पैसे की वसूली के लिए एक सामान्य सिविल मुकदमा दायर कर सकते हैं। अगर आपके पास कर्ज का लिखित सबूत है, जैसे लिखित अनुबंध, हस्ताक्षरित चेक, प्रॉमिसरी नोट या कोई तय (liquidated) रकम, तो आप सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के ऑर्डर 37 के तहत संक्षिप्त मुकदमा चला सकते हैं। यह तेज होता है, क्योंकि प्रतिवादी को बचाव का अपने आप हक नहीं मिलता। पर अगर वह अदालत के सामने कोई ठोस और सच्चा मुद्दा (triable issue) उठाता है, तो अदालत उसे बिना शर्त बचाव का मौका (leave to defend) देती है और मुकदमा पूरा चलता है। एक सीमा याद रखें: ऑर्डर 37 सिर्फ तय, निश्चित रकम पर लागू होता है, हर्जाने या ऐसी रकम पर नहीं जिसे सबूत से साबित करना बाकी हो।

समय की गणना. ज्यादातर फ्रेंडली लोन में समय-सीमा तीन साल है, जो लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 19 के तहत उधार देने की तारीख से गिनी जाती है। अदालतें इस पर सख्त रही हैं: यह दलील कि उधार "मांगने पर" लौटाना था और इसलिए समय-सीमा मांग की तारीख से शुरू होगी, बिना ठोस लिखित सबूत के स्वीकार नहीं होती। अगर उधारकर्ता कर्ज चुकाने के लिए चेक जारी करता है या खाते से भुगतान करता है, तो यह दायित्व की लिखित स्वीकृति मानी जाती है और उस तारीख से तीन साल की नई समय-सीमा शुरू हो जाती है, बशर्ते यह पुरानी अवधि खत्म होने से पहले हुआ हो।

डिजिटल सबूत. यूपीआई ट्रांसफर रिकॉर्ड और बैंक ट्रांसफर रिकॉर्ड यह साबित करने का पक्का जरिया हैं कि पैसा सच में गया। पर अदालत में इन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सबूत के रूप में पेश करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65B के तहत इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्र लगाना जरूरी है। इसके बिना डिजिटल रिकॉर्ड अस्वीकार्य हो सकता है।

एक बात और: समय-सीमा बीत जाने से सिर्फ अदालत के जरिए वसूली का कानूनी उपाय बंद होता है, आपका हक खत्म नहीं होता। इसलिए समय पर कार्रवाई ही आपकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

आप क्या कर सकते हैं

  1. उधार देने की तारीख और लौटाने की शर्तें तय करके नोट कर लें। यही तारीख आमतौर पर आपकी तीन साल की गिनती शुरू करती है, इसलिए अपनी आखिरी तारीख जल्दी निकाल लें।
  2. हर सबूत संभालें: यूपीआई ट्रांसफर रिकॉर्ड, बैंक ट्रांसफर रिकॉर्ड, कोई लिखित अनुबंध या प्रॉमिसरी नोट, और वे मैसेज जिनमें उधारकर्ता कर्ज मानता या लौटाने का वादा करता हो।
  3. अगर आपके पास लिखित अनुबंध, हस्ताक्षरित चेक या प्रॉमिसरी नोट है, तो आप सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के ऑर्डर 37 के तहत संक्षिप्त मुकदमा दायर कर सकते हैं, जो सामान्य मुकदमे से तेज चलता है।
  4. तीन साल पूरे होने से पहले उधारकर्ता से हस्ताक्षरित स्वीकृति या आंशिक भुगतान लेने की कोशिश करें। समय रहते हुआ तो यह समय-सीमा को रीसेट कर देता है और आपको नई तीन साल की मोहलत मिल जाती है।
  5. लौटाने की लिखित मांग भेजें। अगर उधार मांगने पर लौटाना था, तो मांग का सबूत रखें, क्योंकि आपकी समय-सीमा उसी तारीख से चलती है।
  6. डिजिटल पेमेंट रिकॉर्ड को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करना हो, तो साथ में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B का प्रमाणपत्र जुटाकर रखें, वरना वह रिकॉर्ड अदालत में नहीं चलेगा।
  7. समय-सीमा खत्म होने से पहले वसूली का मुकदमा दायर करें। समय चूकना ही इन दावों के फेल होने की सबसे आम वजह है।

अहम फैसले

Ashok Kumar Tiwari v. Rajesh Kumar Yadav, दिल्ली हाई कोर्ट (2016). एक फ्रेंडली लोन की वसूली के मामले में अदालत ने साफ किया कि लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 19 के तहत उधार दिए पैसे की वसूली की समय-सीमा उधार देने की तारीख से तीन साल है। उधारकर्ता के चेक जारी करने को धारा 18 के तहत दायित्व की स्वीकृति माना जाता है, पर जब यहां वह भी समय पर नहीं हुआ, तो मुकदमा समय-सीमा से बाहर होने के कारण खारिज हो गया।

Mortulo Ramchandra Gad v. John Pinto, बॉम्बे हाई कोर्ट (2006). बिना लिखित प्रॉमिसरी नोट या शर्त के दिए गए फ्रेंडली लोन पर अदालत ने माना कि पूरा लेनदेन आर्टिकल 19 के दायरे में आता है और तीन साल की गिनती उधार देने की तारीख से ही शुरू होती है। यह तर्क कि भुगतान "मांगने पर" होना था, बिना ठोस सबूत के स्वीकार नहीं किया जा सकता।

Ramdhari v. State of U.P., इलाहाबाद हाई कोर्ट (2019). अदालत ने माना कि डिजिटल रिकॉर्ड, जैसे सीडी या इलेक्ट्रॉनिक फाइलें, तब तक सबूत के रूप में स्वीकार्य नहीं जब तक उनके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B का अनिवार्य इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्र न लगा हो। यही सिद्धांत यूपीआई और बैंक ट्रांसफर के डिजिटल रिकॉर्ड पर भी लागू होता है।

Multimedia Frontiers Ltd. v. Tikoo Traders Pvt. Ltd., गुजरात हाई कोर्ट (2007). ऑर्डर 37 के संक्षिप्त मुकदमे में अदालत ने माना कि अगर प्रतिवादी कोई सच्चा और गंभीर मुद्दा (triable issue) उठाता है जिससे उसका निष्पक्ष बचाव झलकता है, तो उसे बिना शर्त बचाव का मौका (unconditional leave to defend) मिलना चाहिए। संक्षिप्त प्रक्रिया तेज है, पर सच्चे विवाद को परखा जरूर जाता है।

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यह लेख जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। यह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कानूनों और फैसलों का सार है। गंभीर मामलों में लाइसेंसशुदा वकील से सलाह लें। पूरा डिस्क्लेमर पढ़ें।

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