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उपभोक्ता · vitark.ai

मोबाइल या ब्रॉडबैंड बिल गलत है? कस्टमर केयर से आगे शिकायत कैसे करें

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सार

गलत बिल या खराब सेवा के लिए पहले अपने ऑपरेटर के भीतर शिकायत बढ़ाएं: कॉल सेंटर, फिर नोडल अधिकारी, फिर ट्राई (TRAI) के उपभोक्ता संरक्षण नियमों के तहत ऑपरेटर का अपीलीय प्राधिकरण। ट्राई अधिनियम, 1997 की धारा 14 का परंतुक (B) व्यक्तिगत उपभोक्ता की शिकायत को उपभोक्ता फोरम के समक्ष स्पष्ट रूप से सुरक्षित रखता है, और भुगतान के बदले दी गई टेलीकॉम सेवा उपभोक्ता कानून के तहत 'सेवा' है। पर सरकारी टेलीग्राफ प्राधिकरण के टेलीफोन-बिल विवादों में अदालतों ने भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम की धारा 7B के तहत अनिवार्य मध्यस्थता को ही रास्ता माना है।

कानून क्या कहता है

पहले ऑपरेटर के भीतर शिकायत बढ़ाएं. ट्राई के उपभोक्ता संरक्षण नियम एक शिकायत सीढ़ी बनाते हैं: आप बिलिंग या सेवा की शिकायत पहले ऑपरेटर के कॉल सेंटर में, फिर उसके नोडल अधिकारी के पास, और अगर तब भी हल न हो तो ऑपरेटर के अपीलीय प्राधिकरण के पास रखते हैं। अदालतें आमतौर पर ग्राहकों को पहले यही रास्ता अपनाने को कहती हैं। ट्राई खुद व्यक्तिगत शिकायतों का निपटारा नहीं करता; ट्राई के अपने कार्यों को चुनौती दूरसंचार विवाद निपटान और अपीलीय न्यायाधिकरण (TDSAT) के समक्ष जाती है, उपभोक्ता फोरम में नहीं।

टेलीकॉम एक भुगतान वाली सेवा है. भुगतान के बदले दी जाने वाली टेलीकॉम सेवा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत 'सेवा' है, इसलिए इसमें कमी, जैसे गलत बिल या खराब गुणवत्ता, वहां कार्रवाई योग्य है जहां फोरम आपके लिए खुला हो। सर्वोच्च न्यायालय ने भुगतान आधारित सेवाओं को 'सेवा' की परिभाषा में माना है, और उपभोक्ता मंचों की त्वरित, संक्षिप्त प्रक्रिया ऐसी कमियों के निवारण के लिए उपयुक्त है।

व्यक्तिगत उपभोक्ता की शिकायत सुरक्षित है. ट्राई अधिनियम, 1997 की धारा 14 दूरसंचार विवाद निपटान और अपीलीय न्यायाधिकरण को सेवा प्रदाताओं और उपभोक्ता समूहों के बीच विवादों पर व्यापक शक्ति देती है, पर इसका परंतुक (B) उपभोक्ता फोरम के समक्ष विचारणीय व्यक्तिगत उपभोक्ता की शिकायत को स्पष्ट रूप से अलग रखकर सुरक्षित करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस अपवाद की पुष्टि की है, इसलिए व्यक्तिगत उपभोक्ता की शिकायत न्यायाधिकरण के क्षेत्राधिकार में समा नहीं जाती।

सरकारी टेलीग्राफ प्राधिकरण के बिल विवाद. दूसरी ओर, सरकारी (टेलीग्राफ प्राधिकरण) ऑपरेटर के टेलीफोन-बिल विवादों में कई अदालतों ने सर्वोच्च न्यायालय के पुराने दृष्टिकोण (General Manager, Telecom v. M. Krishnan) का पालन करते हुए माना है कि भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा 7B के तहत वैधानिक मध्यस्थता एक विशेष उपाय है जो उपभोक्ता फोरम और सिविल अदालत के क्षेत्राधिकार को निहित रूप से वर्जित कर देता है। यानी फोरम इस पर निर्भर करता है कि ऑपरेटर की प्रकृति और विवाद क्या है। एक बात और: अगर विवाद धारा 7B मध्यस्थता में जाता है, तो मध्यस्थ को सकारण, विस्तृत आदेश (Speaking Order) देना अनिवार्य है, केवल निष्कर्ष पर्याप्त नहीं।

आप क्या कर सकते हैं

  1. पहले अपने ऑपरेटर के कस्टमर केयर में शिकायत करें और डॉकेट या शिकायत नंबर लें। तारीख और आपने क्या बताया, यह नोट करें।
  2. हल न हो तो ऑपरेटर के नोडल अधिकारी के पास शिकायत बढ़ाएं, और हर संदर्भ नंबर तथा जवाब संभालें।
  3. तब भी हल न हो तो ट्राई के उपभोक्ता संरक्षण नियमों के तहत ऑपरेटर के अपीलीय प्राधिकरण के पास जाएं, अपने बिलों और पूरी शिकायत के ब्योरे के साथ।
  4. व्यक्तिगत उपभोक्ता के तौर पर आपकी शिकायत उपभोक्ता फोरम के समक्ष सुरक्षित है, इसलिए गलत बिलिंग या सेवा में कमी के लिए आप जिला उपभोक्ता आयोग में बिल सुधार, रिफंड और मुआवजे की शिकायत दायर कर सकते हैं।
  5. अगर आपका ऑपरेटर सरकारी टेलीग्राफ प्राधिकरण है, तो बिल विवाद का रास्ता भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा 7B के तहत वैधानिक मध्यस्थता है। कनेक्शन कटने का खतरा हो तो मांगी गई राशि विरोध दर्ज करते हुए चुका सकते हैं, क्योंकि शिकायत सही पाई जाने पर अतिरिक्त रकम बाद में समायोजित की जा सकती है।
  6. सीधे उच्च न्यायालय में रिट न ले जाएं। विशिष्ट मंचों का उपयोग करें, और उपभोक्ता फोरम के आदेश को चुनौती देनी हो तो रिट के बजाय ऊपरी उपभोक्ता आयोग (राष्ट्रीय आयोग तक) में अपील करें।

अहम फैसले

Loop Telecom and Trading Limited v. Union of India, सुप्रीम कोर्ट (2022). न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दूरसंचार विवाद निपटान और अपीलीय न्यायाधिकरण के पास सेवा प्रदाताओं और उपभोक्ता समूहों के विवादों पर व्यापक शक्ति है, पर ट्राई अधिनियम, 1997 की धारा 14 का परंतुक (B) उपभोक्ता फोरम के समक्ष विचारणीय व्यक्तिगत उपभोक्ता की शिकायत को स्पष्ट रूप से अलग रखता है। यह पुष्टि करता है कि व्यक्तिगत उपभोक्ता की शिकायत सुरक्षित है।

Petitioner v. Bharat Sanchar Nigam Limited, तेलंगाना हाई कोर्ट (2010). एक सरकारी ऑपरेटर के खिलाफ टेलीफोन-बिल की शिकायत उपभोक्ता फोरम ने अधिकार क्षेत्र के अभाव में लौटा दी थी। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के M. Krishnan फैसले का पालन करते हुए माना कि टेलीफोन बिल संबंधी विवादों के लिए भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम की धारा 7B का विशेष उपाय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के उपाय को निहित रूप से वर्जित कर देता है।

Indian Medical Association v. V.P. Shantha, सुप्रीम कोर्ट (1995). न्यायालय ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत 'सेवा' की व्यापक परिभाषा रेखांकित की और माना कि भुगतान के बदले दी जाने वाली सेवाएं इसके दायरे में आती हैं। यही सिद्धांत टेलीकॉम जैसी भुगतान वाली सेवा को उपभोक्ता कानून के दायरे में लाता है, जहां सेवा में कमी का त्वरित निवारण संभव है।

M.L. Jaggi v. Mahanagar Telephones Nigam Ltd., सुप्रीम कोर्ट (1996). चूंकि धारा 7B के तहत मध्यस्थता निर्णय अंतिम होता है और सामान्यतः अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, न्यायालय ने माना कि मध्यस्थ के लिए अपने निष्कर्षों के समर्थन में सकारण, विस्तृत आदेश देना अनिवार्य है। अगर आपका बिल विवाद धारा 7B मध्यस्थता में जाता है, तो आप कारणों के हकदार हैं, केवल निष्कर्ष के नहीं।

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